Monday, March 3, 2014

तन्हाई


गर  हमने  वफ़ा  की  है  ,तो  ये  अपनी  कहानी  है 
और  उसने  दुआ  दी  है  ,ये  उनकी  मेहेरबानी  है 


बता  दे  आज  ,कब  ये  बोलता  है , कोई  भी  ,दाता 
की  बोल  तुझमे , और  मुझसा  , कौन  दानी  है 


मोहब्बत   इक  तूफां  नहीं  जो  आकर  गुज़र  जाए 
इसका  न  तो  बुढापा  है  ,और  ना  ही   जवानी  है 


बड़े  बे -आबरू  होकर  हम  लौटे  उनके  कूचे  से 
कहा  तन्हाई  ही , तुम   आशिकों  की  ,जिंदगानी  है 


हमें  उनका  हाल -ए-दिल पता अब चल ही  जाता  है 
हर  मोड़  पे  जब उनके ही   चर्चों  की  कहानी  है 

3 comments:

  1. बहुत खूब ... अच्छे शेर हैं सभी इस गज़ल के ...

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (04-03-2014) को "कभी पलट कर देखना" (चर्चा मंच-1541) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. aapka bahut dhanyvaad digambar ji
    bahut aabhaar mayank daa

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