Friday, October 25, 2019

विष 

रंजिशें  कर  रहा  हूँ  खुद  से , ए वाईज़ तुझे बुरा  कह  के ,
क्यों  नहीं  शिव  सा  पी  लूँ  ये  विष  भी  सुरा  कह  के 

उसने  खुद  तक  किया  मुझे   सिमित , पूरा कह  के ,
तूने  राह -ए -  खुदा  अब  दे  दी  अधूरा  कह  के 


दरीचा  रोशन  सा  हुआ  पंछी  को  जो  दाना  डाला   ,
आता  हूँ  तिनकों  को समेटे  अब   ,वो   उड़ा  कह  के 

हम  है  अदने से  , हर  नज़्म  में  बुलाया  रहमत  को  तुझे ,
कोई  तेरा  चैन  न  ले  "नील "  इनसे  जुड़ा  कह  के !




Sunday, February 22, 2015

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

दिन  प्रतिदिन हर पल हर छीन 
है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

गाता है कुछ ताने -बाने 
जीवन के खुशियों के खजाने 

ढूँढता है आस पास 
बस ख़्वाबों के बिखरे तृण

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

है नीर बनाना मधुवन सा 
न हो वो व्यर्थ कंचन सा 

पथिकों को जो आश्रय दे 
उन्हें जीने का दृढ निश्चय दे 

खुशबू   को जो वहां  खिंच    लाये  
ऐसे तितलियों का बसेरा हो 


हो जाऊं मैं विरक्त मुक्त 
इस जग बंधन से उऋण 

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!









Monday, July 1, 2013

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी!!


तुने ही आब-ओ -दाना दिया है
तू  ही तो है  इक  पालनहारी!!


गुरबत्त  में बस एक तू ही सखा है
ए नाथ ! तेरे बहुत हैं  आभारी!!


क्रोध ,अहमादि  से बचाना 
तू ही है दाता ,हम है भिखारी!!


चले हम सूरज की ओर हमेशा
मन  बने  निर्मल और  अविकारी  

करुणा करना हे  करुणा निधि 
हे द्वारिकापति रास बिहारी !!

मन मंदिर में बस जा केशव  
लाज बचाना सदा हमारी !!

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी...
























Sunday, May 6, 2012

तुझसे पहचान हो मेरी


जैसे एहसासों से बनी कोई तश्वीर हो
किसी दरवेश की बंदगी -ओ -ज़मीर हो

मेरे गुरबत्त में भी चिराग जलता रहे
"माँ " तुझसे पहचान हो मेरी , तेरी तौकीर हो

Friday, May 13, 2011

तुम्हारा प्रेम मेरे लिए !


                 
तुम्हारा  प्रेम 
उस किताब के पन्नो जैसा है 
जो 
अलग होते जाते हैं 
क्रमश एक दुसरे से 
पढने के क्रम में 

पर भरते जाते हैं 
दो अक्षर जीवन को जीने  के 
अपने पाठकों के मन 
में ...

तुम्हारा  प्रेम 
उस
किताब के पन्नो जैसा है
जो तिरस्कृत 
होने के बाद भी 
आपस में जुड़े रहते हैं ...
और 
बताते हैं कि
ज़मीन से जुड़े  रहो 
हर मुसाफिर को ...

तुम्हारा  प्रेम 
उस खाली
कापी के जैसा है 
जो 
अपने न भरने 
तक मेरे कलम के 
स्याह के उन्मुक्त बौछारें 
और 
उसके 
नीब के चोटों को 
सहता रहता है ....

और फिर उस कलम को 
बिना बोले मान दिलाता है ...

तुम्हारा प्रेम 
उस शहद के जैसा है
जो 
मधुमक्खी को पहचान देती है
उसके उद्यम के कारण
उसके सदभाव के कारण
न क़ि
उसके दर्द देने वाले डंक के कारण ...


Thursday, May 5, 2011

अभिनय करते हैं मेरे शब्द

अभिनय करते हैं मेरे शब्द
भावों के निर्देशन पर 
वक्ता स्वयं और द्रष्टा स्वयं 
बनता हूँ मैं मंथन कर कर 

अंतर्ध्वनि को काले अक्षर 
में कह जाता हूँ 
शीतलता गंगाजल सी 
मैं अर्पण करता जाता हूँ 

अभिमत होता हूँ इनसे
ये मेरे मन के वशंज हैं 
कष्टों के इस सर में 
वो खिलते एक पंकज हैं 

उनके आकर्षण से 
शब्द बादल बन बरसते हैं 
मन की घाटी से तब 
शब्दों के धार निकलते हैं 

ये शब्द एक दर्पण हैं 
जो निज से सबको मिलाता है 
उनके अस्तित्व का 
ये दर्शन उन्हें कराता है 

इसके बंधन में बंधने से
हर बंधन छूट जाता है 
हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

शायद वो पत्थर की लकीरें खींचता नहीं

संचित किए ही जाते हैं, कोई सींचता नहीं  इस धरा पे क्यों मानव का मन रीझता नहीं   क्यों रव्वैये आज भी उसके पुराने हैं,  शायद वो पत्थर की लकीरे...