Sunday, March 27, 2016

खामोश

वो तो सुनता है मगर  ,खामोश रह जाता है
इम्तेहान -ऐ -ज़ीस्त में कब होश रह जाता है ?

कोई हुजूम आया नहीं ,अब कर रहे क्यों गिला
अप खुद से न मिले,क्या  दोष रह जाता है ?

किस तरह से ज़मीं ठण्ड से बातें करे
और गवाह में किस तरह बस ओस रह जाता है !

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-03-2016) को "सूरज तो सबकी छत पर है" (चर्चा अंक - 2296) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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