Monday, March 13, 2017

रँग

चुपचाप   सा  रह  जाना ,आपके  मामूल  क्यूँ  हैँ ,
जो  सब  होता  हो  ये  आपको  माकूल  क्यूँ  हैँ

किस  रँग  के  उतर  जाने  की  बात   करते  हैँ ,
रँग  देखने  में  भला इतने  मशगूल  क्यूँ  हैँ

कितनी  नज़्मों  में  हमारा  ज़िक्र  आया  था ,
बस  चंद  हर्फ़  हि  आपको   मक़बूल  क्यूँ  हैँ

ये  तो  पाँव  के  निशाँ  थे  दौर -ऐ -सफर  में , देखिए ,
फिर  नज़रिये  में  ये  रास्ते  के  धूल  क्यूँ  हैँ

अजूबे

पानी के रँग में डूबे हैँ ,कौन पहचाने
सब सफर में हैँ और  ऊबे हैँ ,कौन पहचाने

चंद गलियों के अफ़साने ,सुनाया करते
इस जहाँ में क्या अजूबे हैँ ,कौन पहचाने

Thursday, December 1, 2016

अपना भी ज़माना होगा अब


है उम्मीदें दामन में ,दर्द का न अब कोई फ़साना होगा
न होगा इतेफाक ही कोई ,न अब कोई बहाना होगा 
इम्तेहान हो कोई भी , तयार हैं हम दिल -ओ -जान से 
मुद्दतों बाद अपना भी ,अब कोई ज़माना होगा !! 


है अजनबी शहर तो क्या ,हर दिल ही अपनी मंजिल है 
भीड़ में खोते नहीं , ऐसे दीवानों की ये महफ़िल है 
है सफ़र पे आज अपने साथ फिर से ख़ुशी 
गुलशन अपने यारों का ,न अब कभी वीराना होगा !!

Tuesday, November 1, 2016

पहचान

कपास को बड़ी अदब से कात रहा है जुलाहा 
उड़  जाता वो  इधर - उधर   बिन पहचान के 

पर  आज उस  शामियाने की पहचान उससे है !!

Wednesday, October 5, 2016

कितने मौसम आते हैँ!

कितने मौसम आते हैँ ,जब पंछी मिलकर गाते हैँ
बादल ज्यूँ उड़ जाता है ,वो चुपके से खो जाते हैँ

खामोशी में धड़कन कब होती हैँ खामोश ,
हर्फ़ों में ,इन ग़ज़लों में अक्सर उनको पाते हैँ

मिलना कब होता है ,है मशरूफ बहुत हर इन्सान
किनसे मिलते हैँ और जाने किनकी बात सुनाते हैँ

रस्ता रस्ता मंजिल मंजिल ,हर महफिल हर कूचे में ,
कितने सपने बुनते हैँ,कितने आह छुपाते हैँ

उखरे उखरे लगते हो ,बिखरे बिखरे लगते हो ,
तुम भी घर  हो आओ  "नील ",हम भी घर से आते हैँ