Thursday, December 15, 2011

दिन मेरा ढल गया

लगता है तीर दिल के पार निकल गया 
सुबह है अभी  मगर दिन मेरा ढल गया 

बुलाया उन्होंने ,गए शिद्दत से दिल लेकर
और गए तो वहाँ का मौसम बदल गया

लगता है ज़माने को पता चल गया था
इसलिए शम्मा से पहले परवाना जल गया

जब तगाफुल किया हुस्न को शिरत देख
तो वो खुदगर्ज़ सर-ए-आम दहल गया

ज़ीस्त को बनाया ही क्यों ठंडी बर्फ से
जो ज़रा सी गरमी से आज पिघल गया

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल अब दीखते नहीं
बेअदब जूनून बचपन को निगल गया


ग़म-गुसार नहीं अब रहा ये ज़माना भी 
जिसको दी थी मुरब्बत वो ही छल गया 

ये तंज ही तो है कि सब मिसाल देते हैं 
कि मेरा हश्र देख ये गुलशन संभल गया 

आपसे क्या कहते तश्वीर से ही बोले ,मगर 
"नील "अब  तो उसका भी मन बहल गया 



5 comments:

  1. बेहद खुबसूरत नज़्म ..

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  2. बहुत खूब.....
    बेहतरीन ग़ज़ल....

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  3. ये तंज ही तो है कि सब मिसाल देते हैं
    कि मेरा हश्र देख ये गुलशन संभल गया
    वाह क्या बात है बहुत खूब लिखा है आपने बधाई
    समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  4. aap sabhi ke sneh ka bahut aabhaari hoon

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...