Sunday, January 27, 2013

वो दौर याद है तुम करते थे जब वाह-वाह


मत पूछिए फ़िराक में अब हाल कैसा था 
कि रोशनी कैसे हुई ,मशाल कैसा था 

फौजी जो घर गया तो इकबाल कैसा था 
कोई क्या कहें कि उनका जलाल कैसा था 

बादल भी आये कि नहीं खेत तक वहाँ 
उस गाँव का बीता हुआ साल कैसा था 

काफिर किसे सब लोग कह रहे थे वहाँ 
अब की खुदा के नाम पर बवाल कैसा था 

फूटपाथ पर दो चार बचपन दिखे थे कल 
उन मासूम निगाहों में सवाल कैसा था 

खामोशियाँ करती दिखी थी रक्स कुछ ऐसे 
साज था कैसा ,सुर-ओ-ताल कैसा था 

बच्चे जहां पे खेलते थे हो के बेपरवा 
जाने वो बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल कैसा था 

वो दौर याद है तुम करते थे जब वाह-वाह !
और पूछता था मैं,मेरा ख्याल कैसा था ?

अबकि धुआँ भी नहीं देखा कहीं पर फिर 
पानी में आ रहा था जो उबाल कैसा था 

यूँ तो नहीं रोक था हमें जाते हुए तुमने 
फिर यार चेहरे पर तेरे मलाल कैसा था !

मत पूछिये तिनका कहाँ बिखरा है आज "नील" 
आँधी से हुआ नीड़ पायमाल कैसा था 

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फ़िराक: separation
इकबाल:success ,good fortune 
जलाल ; splendor,majesty 
काफिर:atheist,naastik

रक्स :dance
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल:playground for children 
पायमाल :ruined

Wednesday, January 23, 2013

अपनी धुन में रहने वाले

अपनी धुन में रहने वाले ये तो  बता तेरा नाम है क्या 
जुर्म की कोई नयी सजा है या फिर एक ईनाम  है क्या ?

कूचा कूचा ,ज़र्रा ज़र्रा ,रफ्ता रफ्ता ,घड़ी घड़ी 
मत पूछो यारों राही का, भी कोई अंजाम है क्या ?

एक मेरा कोर सा काग़ज़ ,एक तेरी नन्ही  सी कलम 
स्याही भरना,लफ्ज़ पिरोना, इस से इतर कोई काम है क्या ?

ए दूर से आने  वाले  पंछी ,ओ चूं   चूं गाने वाले पंछी 
ये तो बता दे ,पास तेरे ,घर का कोई पयाम है क्या 

आलम था कुछ ऐसा ही ,और था ऐसा दीवानापन 
कि न दिन की  कोई खबर रही ,न सोचा कि शाम है क्या 

फौजी सरहद पे जीता है ,रोता ,हँसता ,मरता है 
कोई भी मौसम हो उनकी दुनिया में आराम है क्या 

सोने की कीमत है साहिब ,मिट्टी का कोई मोल नहीं 
जीते मरते इस माटी  में इसका कोई दाम है क्या 

पैमाना तू मत दे साकी,हमें ज़िन्दगी  काफी है 
पीने वाले क्या समझेंगे ,कि इसकी  दो जाम है क्या 

रहती है क्यों अब खुद से अनजानी सी आँख मेरी 
"नील" तरसती आँखों में ख़्वाबों का निजाम है क्या 
................................
निजाम:rule 

Sunday, January 13, 2013

आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी


आँखों की तपिश देर तक आँखों में रहेगी 
मुझ सी ही सीरतें मेरी राखों में रहेगी 

तब तक ही रहेगा वजूद आपका साहब 
जब तक की सच्चाई  बातों में रहेगी 

तुम तेग उठाओ या बारूद समेटो 
कापी कलम स्याही मेरी हाथों में रहेगी 

तुम देख लेना जब बयाँ होगी सच्चाई 
तब उंगलियाँ सब की यहाँ दाँतों में रहेगी 

युहीं अगर चुपचाप सारे देखते रहे 
तो सिसकियाँ हर मोड़ और राहों में रहेगी 

मैं सोचता हूँ रोज़ ही कुछ देर के लिए 
महफूज़ कब ये ज़िन्दगी रातों में रहेगी 

ये कहाँ सोचा था बिछड़ने के बाद "नील"
कि  उनकी छवि हर वक़्त यादों में रहेगी 

Sunday, January 6, 2013

ख्वाब सी है ज़िन्दगी

ख्वाब देखती हैं आँखें ,ख्वाब सी  है ज़िन्दगी 
अपनी तो कापी कलम किताब सी  है ज़िन्दगी 

कभी है महफिलों का शोर ,है जश्न-ए -दुनिया 
कभी खामोश लबों  की जवाब सी है ज़िन्दगी 

खुश्बू भी है ,खार भी है ,जीत है ,हार भी है 
लगता हैं क्यूँ हर घड़ी  गुलाब सी है ज़िन्दगी 

कैसी है ये खलिश ,कैसी तमन्ना है जवाँ 
जाने किस किस जुर्म की हिसाब सी है ज़िन्दगी 

छुप नहीं सकता है यारा तेरे रुख से माजरा 
कहते हो फिर भी कि लाजवाब सी है ज़िन्दगी 

ओढ़ लेता है इसे हर आदमी मौत तक 
उस खुदाया से मिली नकाब सी है ज़िन्दगी 

सहर से ये शाम तक है दौड़ती  राह पर
जलती बुझती एक आफताब सी है ज़िन्दगी 

बिन पिए ही हो गया है नशा मुझे देर तक 
ऐसी अलबेली इक शराब सी है ज़िन्दगी 

खुद से लडती हुई है नील ये इक दास्ताँ 
कुछ अलग सी एक इन्कलाब सी है ज़िन्दगी 

Wednesday, January 2, 2013

पढ़ गया

इस  शहर  में  ईमान  ऐसे  मर  गया 
इक  मसीहा  क़त्ल  होके  घर   गया

ज़ुल्म  की  खेती  तो  सर -ए -आम  है
गोदाम  में  अनाज  लेकिन  सड़  गया

कातिल  बन  गया  है मुनसिब देख लो
लोग  कह  रहे  हैं  कि वो  सुधर  गया

तुम  मायने  देखो  न  दोस्त ग़ज़ल  का
ये  क्यूँ  कहते  हो  कि  इसका बहर गया

क्या फ़राज़ क्या ग़ालिब मोमिन-ओ-फैज़
आज  नील  पूरे दिल  से  सबको  पढ़  गया 

Tuesday, January 1, 2013

साथ ही रहने दो

उसे उसके साथ ही रहने दो अलग न करो ..
थपेरों वो सह नहीं पायेंगे तूफ़ान के... 

शीशे को खश में संभाल कर ही रखा जाता है !