Friday, March 6, 2015

एक मैं और बेगर्ज़ एक कलम मेरा

ज़र्रे ज़र्रे में मेरी रोशनी समाने दो 
ग़म-ए -दुनिया में एक रास्ता बनाने दो 

एक मैं और बेगर्ज़ एक कलम मेरा 
शब-ए-तन्हाई में बैठे हैं दीवाने दो 

परखी जायेगी कश्तियों की बनावट 
अभी लहरों का ज़खीरा तो आने दो 

ज़िन्दगी हर मोड़ पे समझाती है 
उसे खुद ही अब संभल जाने दो

वो यही माँगता रहा लिख कर
ख्वाब काग़ज़ पे बस सजाने दो

मैं गर नहीं तो ये नज़्म ही "नील"
मेरे अजीजों को अपनाने दो

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...