Saturday, October 6, 2012

कर रहा है उसी से अब दिलजोई भी

सिखा है उसी से हमने ग़ज़लगोई भी ,
बड़ी काम की है उसकी साफगोई भी 

फिर कोई पल हमने संजोई भी ,
फिर से कलम स्याही में डुबोई भी 


ग़ालिब तेरे अशरार में क्या बात है ,
जो देर तक खो जाये उनमे कोई भी

आज फिर बादल आ कर के गए ,
आज फिर इक बीज हमने बोई भी

आ गया बूढ़ा ,वही प्याला दिखा
खुल गयी है उसकी अब रसोई भी

देखो हिना से तश्वीर कैसी खिल गयी
कर रहा है उसी से अब दिलजोई भी

बोलता है पन्ना पन्ना किताब का,
नील आँखें जागती हैं कि सोई भी 


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साफगोई :स्पष्टवादिता
ग़ज़लगोई :ग़ज़ल कहने की प्रक्रिया
अशरार :शेर का बहुवचन
दिलजोई: दिलासा देना ,तसल्ली देना ,सान्तवना

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (07-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  3. mayank da aapka bahut aabhar ,
    charcha manch me sthan de kar gauravantit karne ka bahut shukriya
    saaadar,

    sushma ji bahut shukriya aapke hauslahafzaai ka

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  4. बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  5. बहुत ही खुबसूरत..
    सुन्दर अभिव्यक्ति...
    :-)

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  6. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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  7. आपका बहुत आभार संजय जी
    सादर

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