इसको महज़ बात न समझो,
बस एक मुलाक़ात न समझो।
ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़,
इसको कभी भी मात न समझो।
हो जाएगा रोशन हर पन्ना,
बस कोरा एक दवात न समझो।
करते हैं रब से ही गुज़ारिश,
नज़्म को सवालात मत समझो।
शोहरत और ये शहर की महफ़िलें,
बस इनको ही कायनात मत समझो।
देता है पेड़ सबको अपनी छाँव,
इसको तो तुम ख़ैरात मत समझो।
शायर की मुश्किलें बहुत हैं "नील",
रंगीन ख़यालात मत समझो।











