Saturday, September 5, 2026

बस एक मुलाक़ात

इसको महज़ बात न समझो, 

बस एक मुलाक़ात न समझो।

 

ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़, 

इसको कभी भी मात न समझो।

 

हो जाएगा रोशन हर पन्ना, 

बस कोरा एक दवात न समझो।

 

करते हैं रब से ही गुज़ारिश, 

नज़्म को सवालात मत समझो।

 

शोहरत और ये शहर की महफ़िलें, 

बस इनको ही कायनात मत समझो।

 

देता है पेड़ सबको अपनी छाँव, 

इसको तो तुम ख़ैरात मत समझो।

 

शायर की मुश्किलें बहुत हैं "नील",

रंगीन ख़यालात मत समझो।

पहचान

 

खोये कहाँ हैं, अब किधर पहचान है बाक़ी, 

उखड़ी सी हैं साँसें, मगर अरमान है बाक़ी।

 

काग़ज़ है अपना मन्दिर, और कलम मेरा ख़ुदा, 

बस थाम लूँगा उसको, ईमान है बाक़ी।

 

हर रक़्स में वही हैं, धुन में वही बसा, 

जो वो है तो हम में भी, इंसान है बाक़ी।

 

हैं नज़्म, गीत और कुछ अशआर के मुरीद, 

अभी "नील" का  पूरा इक दीवान है बाक़ी।

Sunday, May 18, 2025

नदियों का विस्तार तो देख

सागर से मिलने से पहले नदियों का विस्तार तो देख, 
मिट जाने से पहले अपने होने का आधार तो देख 

कुदरत है आँखों के आगे, कुदरत है मन के भीतर 
भूल के माजी की खामोशी, आज के ये त्योहार तो देख 

स्याह अँधेरे में कब तक ये मशाले साथ निभायेंगी 
शम्मा बन जा खुद हि फिर जीवन की रफ्तार तो देख 

ऐ राही मेरी आँखें तो, पत्थर की हो गयी कब के, 
तू अपने अंतर्मन से ,इन आँखों में प्यार तो देख 

कितनी कमियाँ हैं गजलों में, नज्मों में, छंदों में "नील" 
इनसे है रूसवाई किनको, किनको है स्वीकार तो देख

Friday, May 16, 2025

सँभाल कर रखिये


नाज़ुक है दिल सँभाल कर रखिये,

ना मोम सा इसे ढाल कर रखिये 


किन्हीं एहसासों का नाम है ग़ज़ल,

उन एहसासों को सँभाल कर रखिये


ये ग़ज़ल नहीं रहेगी उम्र भर,

ये वहम भी मत पाल कर रखिये


सबसे मुहब्बत कर रहे हैं तो, 

ना खुद को कभी टाल कर रखिए


थोडा सा ही लेकिन कभी कभी, 

अपनी लहू को उबाल कर रखिए


ऐ "नील" हो सुकून जिधर भी,

 लंगड़ वहीं पे डाल कर रखिए





Friday, October 25, 2019

विष 

रंजिशें  कर  रहा  हूँ  खुद  से , ए वाईज़ तुझे बुरा  कह  के ,
क्यों  नहीं  शिव  सा  पी  लूँ  ये  विष  भी  सुरा  कह  के 

उसने  खुद  तक  किया  मुझे   सिमित , पूरा कह  के ,
तूने  राह -ए -  खुदा  अब  दे  दी  अधूरा  कह  के 


दरीचा  रोशन  सा  हुआ  पंछी  को  जो  दाना  डाला   ,
आता  हूँ  तिनकों  को समेटे  अब   ,वो   उड़ा  कह  के 

हम  है  अदने से  , हर  नज़्म  में  बुलाया  रहमत  को  तुझे ,
कोई  तेरा  चैन  न  ले  "नील "  इनसे  जुड़ा  कह  के !




Sunday, February 22, 2015

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

दिन  प्रतिदिन हर पल हर छीन 
है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

गाता है कुछ ताने -बाने 
जीवन के खुशियों के खजाने 

ढूँढता है आस पास 
बस ख़्वाबों के बिखरे तृण

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!

है नीर बनाना मधुवन सा 
न हो वो व्यर्थ कंचन सा 

पथिकों को जो आश्रय दे 
उन्हें जीने का दृढ निश्चय दे 

खुशबू   को जो वहां  खिंच    लाये  
ऐसे तितलियों का बसेरा हो 


हो जाऊं मैं विरक्त मुक्त 
इस जग बंधन से उऋण 

है प्रयत्न शील ये मन उद्दिग्न !!!









Monday, July 1, 2013

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी!!


तुने ही आब-ओ -दाना दिया है
तू  ही तो है  इक  पालनहारी!!


गुरबत्त  में बस एक तू ही सखा है
ए नाथ ! तेरे बहुत हैं  आभारी!!


क्रोध ,अहमादि  से बचाना 
तू ही है दाता ,हम है भिखारी!!


चले हम सूरज की ओर हमेशा
मन  बने  निर्मल और  अविकारी  

करुणा करना हे  करुणा निधि 
हे द्वारिकापति रास बिहारी !!

मन मंदिर में बस जा केशव  
लाज बचाना सदा हमारी !!

हे कृष्ण गोविन्द गिरिधर मुरारी
जो हम है वो कृपा तुम्हारी...
























Sunday, May 6, 2012

तुझसे पहचान हो मेरी


जैसे एहसासों से बनी कोई तश्वीर हो
किसी दरवेश की बंदगी -ओ -ज़मीर हो

मेरे गुरबत्त में भी चिराग जलता रहे
"माँ " तुझसे पहचान हो मेरी , तेरी तौकीर हो

Friday, May 13, 2011

तुम्हारा प्रेम मेरे लिए !


                 
तुम्हारा  प्रेम 
उस किताब के पन्नो जैसा है 
जो 
अलग होते जाते हैं 
क्रमश एक दुसरे से 
पढने के क्रम में 

पर भरते जाते हैं 
दो अक्षर जीवन को जीने  के 
अपने पाठकों के मन 
में ...

तुम्हारा  प्रेम 
उस
किताब के पन्नो जैसा है
जो तिरस्कृत 
होने के बाद भी 
आपस में जुड़े रहते हैं ...
और 
बताते हैं कि
ज़मीन से जुड़े  रहो 
हर मुसाफिर को ...

तुम्हारा  प्रेम 
उस खाली
कापी के जैसा है 
जो 
अपने न भरने 
तक मेरे कलम के 
स्याह के उन्मुक्त बौछारें 
और 
उसके 
नीब के चोटों को 
सहता रहता है ....

और फिर उस कलम को 
बिना बोले मान दिलाता है ...

तुम्हारा प्रेम 
उस शहद के जैसा है
जो 
मधुमक्खी को पहचान देती है
उसके उद्यम के कारण
उसके सदभाव के कारण
न क़ि
उसके दर्द देने वाले डंक के कारण ...


Thursday, May 5, 2011

अभिनय करते हैं मेरे शब्द

अभिनय करते हैं मेरे शब्द
भावों के निर्देशन पर 
वक्ता स्वयं और द्रष्टा स्वयं 
बनता हूँ मैं मंथन कर कर 

अंतर्ध्वनि को काले अक्षर 
में कह जाता हूँ 
शीतलता गंगाजल सी 
मैं अर्पण करता जाता हूँ 

अभिमत होता हूँ इनसे
ये मेरे मन के वशंज हैं 
कष्टों के इस सर में 
वो खिलते एक पंकज हैं 

उनके आकर्षण से 
शब्द बादल बन बरसते हैं 
मन की घाटी से तब 
शब्दों के धार निकलते हैं 

ये शब्द एक दर्पण हैं 
जो निज से सबको मिलाता है 
उनके अस्तित्व का 
ये दर्शन उन्हें कराता है 

इसके बंधन में बंधने से
हर बंधन छूट जाता है 
हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

दिनकर

उसके गीतों के ज्वाला ने लोहा तक पिघलाया था 
सोये भारत मन में भी एक नवसंचार जगाया था  
उसके कलम में वीरों के शहादत  का प्रतिशोध था 
भारत माता के दुश्मन को थर्राने का क्रोध था 

आंच तिरंगे की रखने को उनके शब्द बेताब थे 
गिरिवन के सिंहों के जैसे करते वो सिंहनाद थे 
हिंदी-साहित्य   का वो एक अमूल्य वरदान था 
क्रान्ति का अग्रदूत और भारत का  शान था 

उसने बिन बोले ही तब जवानों  को हर्षाया था 
उनके धमनियों  में  एक  सैलाब  सा  लाया  था 
माथे पर कोई सिकन नहीं कदमो में तब जान थे 
उसके लेखन में बस  क्रान्ति  के फरमान थे 

उनके सानिध्य में सोना कुंदन बन जाता था 
हर पन्ना उनका तब बलिदानी गीत गाता था 
बिन कटार के ही वो कलम का सिपाही था 
क्रान्ति के पथ पर वो निर्भय एक राही था 

उसके गीतों से संप्रभुता के स्वर निकलते थे 
गद्दारों के अरमानो पर बादल   बन बरसते थे 
वो इस  हिंद देश के कवियों का स्वाभिमान था 
शब्दों के उस मंदिर का "दिनकर" ही नाम था 


...










Wednesday, May 4, 2011

और भेंट हो गयी मेरे जड़ का मेरे चेतन से...





एक टूटते तारे सी
आई और गयी
वो
पतझड़ जैसे,
छोड़कर
लाखों सवाल
हर तरफ,
कर के सूना
मेरी यादों के वृक्ष को
सींचा था जिसे
मैंने
अश्कों से अपने,
लहलहाने
उसके जवाबों के
हरे भरे पत्तों को..

उम्मीद थी
वो आएगी
एक वसंत बनकर
मेरे पीले पड़े हुए
पत्तों को रंगनें
अपने हरे रंग में

नहीं पता था
मुझको
उसे तो था प्रेम
मेरी जड़ों से
मेरे पत्तों से नहीं
और वो
मेरे यादों के वृक्ष को
झकझोर कर
मेरे जड़ के
पोषण हेतु
भेंट कर गयी
मेरे ही कुछ पुराने पत्तों को

और हो गयी भेंट
मेरी जड़ की
चेतन से मेरे...

Tuesday, April 26, 2011

वो रौशनी सूरज की और मेरे कलम की स्याही ....

अक्सर वो झांकता है 
और साथ में 
कुछ छुपे हुए समस्याओं से
भी अवगत कराता है 

जब अँधेरे कमरे में बैठे हुए
पुराने कागजों पर 
अपनी व्यथा लिखता हूँ 
धीरे धीरे  मन की समस्याओं से
परिचित हो जाता हूँ 
समाधान भी मिल जाता है 

ठीक उसी तरह जैसे बंद कमरे में पड़ी धुल
उसके आने से स्पष्ट दिखाई दे जाती है 
मेरे खिड़की खोलने के बाद 
और घर की सफाई करने को इंगित करती है ..

वो रौशनी सूरज की 

और मेरे कलम की स्याही ....
दोनों कभी कभी एक से लगते हैं ...


जब प्रकृति अपने चमत्कारों से रूबरू हमें कराती है

 पत्ते पर  परे ओस की बूंदे
मोती नहीं होती 
पर किसी पपीहे ,किसी भौरें 
की प्यास बुझा सकती है 

किसी राहगीर को जीवन दान 
और स्फूर्ति  दे सकती है 

मोतियों के  माला की 
कीमत नगण्य हो जाती हैं 

जब प्रकृति अपने चमत्कारों से 
रूबरू हमें कराती है 

जौहरी मोती की  पहचान कर सकता है 
सुख सुविधा से संपन्न वो 
उसकी  कीमत का अनुमान कर सकता है 

पर प्रकृति सर्वथा अनमोल है 
उसकी शक्ति निरंतर एवं अविरल है 
उस की महिमा का  वो थका हारा पथिक ही 
बखान कर सकता है 




ओ दूर से टिमटिमाने वाले तारे

 तेरे न टिमटिमाने को 
को न समझूंगा तेरा न होना

बादलों में होड़ होगी तुझे
देखने की तो
मेरे भोले मन को क्यों रोना

चांदनी रात में तेरे टिमटिमाने को
मैं नहीं भूलूंगा
की चाँदनी तो कुछ दिन के लिए
होती है मेरे साथ
तू मुझे हमेशा मुझे मुस्कुराना
सिखाता रहता है


रात को तू टिमटिमाता है
मेरे दूर के तारे
और सूरज तेरा दोस्त
तेरी कमी को
सवेरे पूरा करता रहता है

तू बहुत उदार है मेरे तारे
तुझे बचपन से देखता आ रहा हूँ
तू टिमटिम करे या नहीं
सूरज की लाली मेरे मन के बंजर
का करता है नित्य सिंचन

सूरज अपनी लाली से
काली रात्री के भय से
मुझे मुक्त कर मेरे कल
का करता है नव सृजन

शायद कल मैं तुझसे बहुत दूर
हो जाऊं
शायद तुझे क्या सूरज को भी
देखने को तरस जाऊं
पर तेरा वो रोज़ टिमटिमाना
मुझे इंगित करता रहेगा
कि तू हमेशा मुस्कुराता है
और तेरी मुस्कराहट
अमावस की रात को
और भी बढ़ जाती है ...
और मुझे संबल देती है मेरे जीवन
के आने वाले संघर्ष के लिए...


ओ दूर से टिमटिमाने वाले तारे
तेरे न टिमटिमाने को
को न समझूंगा तेरा न होना ..

Sunday, April 24, 2011

और आज उस तार के पेड़ को को हम चुनौती देते हैं

वो ताड़  का पेड़ अब भी है 
कल उसके ऊपर वो नशा करने वालों 
को अमृत पिलाने का कार्य करने वाला 
वो 
गरीब घर का एक आम आदमी 
बड़ी चपलता से ,निर्भयता  से ऊंचाई 
पर पहुँच जाता था 
और हम उसके इस करतब को निहार 
कर प्रस्सन होते थे
सोचते थे की काश हम भी 
उस ऊंचाई पर चढ़ नीचे की दुनिया को 
देख पाते पर हमें क्या पता था की 
उंचाई पर चढ़ने के लिए बहुत साहस का होना 
जरूरी है 
आज उस ताड़ के पेड़ के बगल में एक ऊँचा इमारत खड़ा है और
हम आसानी से उसके मुंडेर  पर खरे  हो
उसपर बैठे पंछियों को निहारा करते हैं 
और आज उस तार के पेड़  को को हम चुनौती देते हैं 
हम उसके ऊंचाई तक पहुँचने के लिए
सीढ़ी का इस्तेमाल करते हैं 
और वो ताड़ी बेचने वाला अपने पैरों और हाथों  का ....



Saturday, April 23, 2011

उन पन्नों के सानिध्य में



हर पन्ने कहाँ कुछ बोलते हैं 
किसी के मन को कहाँ वो टटोलते हैं 

तेरे लिखे को किसी  योग्य पुस्तक  
के ह्रदय में  स्थान  तो मिल जाता है 

पर तेरे लेखनी को सार्थकता कहाँ 
वो देते हैं 

तेरे  पन्ने के साथ वाले पन्ने 
अगर किसी स्नेहयुक्त स्याही
से रचित किये गए हैं 
तो उन   पन्ने को  सदा स्थान मिलता है
उस पुस्तक के ह्रदय में 
पर इस मर्म को कौन समझते हैं 


उन पन्नों के सानिध्य में वो
अनजाना पन्ना भी एक दिन 
पुस्तक में परिवर्तित हो जाता है 


और पन्नो को समेटने का 
कर्त्तव्य निभाता जाता है 
एक जौहरी के जैसा 

और पन्ने से पन्ने तब  रोज़ सीखते हैं 

Friday, April 22, 2011

शिव ने जिसको मस्तक पर धारा...


नदी के किनारे 
वो सवेरेसवेरे आया करता है 
ढूँढने अपनी परछाई
उसके बहते पानी में
पर जैसे उसका मन स्थिर नहीं है
वो बहता पानी भी नहीं

तो उसे अपने
सत्य स्वरुप का दर्शन कहाँ होगा 
अपने मन के दर्पण में झांक की तेरा मन ही 
तुझको संवारेगा ,यूँ गंगा गोदावरी के अर्चन से 
तुझे आत्म-अवलोकन कब होगा

वो कितना पाप धोएगी 
कितनो के आंसूं ढोएगी
अब उठ और आगे बढ़ 
की तेरे मन में ही कहीं गंगोत्री है 
शिव ने जिसको मस्तक पर धारा
वो गंगा तेरे मन का मैल धोती है 
शिव का है प्रताप ,वो गंगाधर कहलाये 
हर मनुष्य के मन में ही है गंगा 
क्यों भटके हम बौराए 

  

Thursday, April 21, 2011

समुद्र के किनारे परे वो सीप

समुद्र के किनारे परे वो सीप 
आते हैं समुद्र के लहरों से निकलकर
चुनता है कोई उसे 
पिरोता है मालों में
कोई ले जाता है उसकी सुन्दरता से मुग्ध होकर 
फिर बढ़ाते हैं वो शोभा घर की 
वो सीप जो कभी किसी जीव का रक्षा कवच था 
आज शोभा बढा रहा है किसी के घर का 
अपने पालक होने का अस्तित्व निभाकर उसने 
अब दुसरे कर्त्तव्य को धारण कर लिया है 
पर उसे तराशने वाला वो माला  पिरोने वाला 
वो उस सीप के लिए एक इश्वर है
जो की उसमे एक नव जीवन देता है 
एक पहचान देता है
उस सीप को जिसे समुद्र की लहरें कभी रेत तो कभी पानी
के बीच कुदेरेते रहते हैं....इस जीवन के तरह जहाँ मानव एक सीप है 
और पहचान की तलाश में भटक रहा है सच और झूठ के खेल के बीच ..
इंतज़ार है इश्वर का...

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The snail shells are lying along the shore of the ocean
crumbling in summer ,winter ,spring,rain so often

After the tides come and throw them out of its engulf
before a tide comes, somebody pick them up 

and turned them into decorative masterpiece
which gave the beauty of the home a divine bliss

the common man who appreciate their values is a god 
The shells which were no where is now in abode


the shells which protect the little snails during its life time
has now got a new image and a new avatar just because of his artistic divine. 


The shells which were being corroded going here and there
between  the sea waves and the sand 
have got a rescuer ..........


And same is with the humans
who are wandering in this life and entangled between the foul play of lie and the truth..
waiting for the almighty to deliver ...

बस एक मुलाक़ात

इसको महज़ बात न समझो,  बस एक मुलाक़ात न समझो।   ढल जाता है सूरज भी रोज़-रोज़,  इसको कभी भी मात न समझो।   हो जाएगा रोशन हर पन्ना,  बस कोरा एक...