Thursday, May 5, 2016

ग़ज़ल

सहरा की तपिश में हरे जंगल क्यूँ लौटे
बरसात की ख्वाहिश न थी ,बादल क्यूँ लौटे

पूछा नहीं की बिना ग़ज़ल क्यूँ लौटे ,
लकिन बाज़ार से बिना चावल क्यूँ लौटे

शहरों में आ रही है लहर कितने वाइजों की ,
न गिनिए की गाँव में कई पागल क्यूँ लौटे

जाते हैँ आप किस तरह,आते हैँ फिर कैसे
घुड़सवार थे भले मगर पैदल क्यूँ लौटे

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-05-2016) को "फिर वही फुर्सत के रात दिन" (चर्चा अंक-2334) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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