Monday, November 11, 2019

जो कहते हो तुम वो कोई ना कहे

कैसी शगलों में रहते हो डूब जाते हो
नौकाओं को देखो जब भी ऊब जाते हो

पेड़ पुकारे जड़ के लिये , तुम प्रेमी पत्तों के
दर्शन के अभिलाषी  मिलने खुब जाते हो ,

हमने खुद को बदला या तुम मन के ईश्वर
भ्रम में रखते हो बन कर महबूब जाते हो

जो कहते हो तुम वो कोई ना कहे कभी
जब लिख  दूँ वो सब ,कह के मकतूब जाते हो

नील से पहले भी, बाद भी,संग भी हो मौजूद
क्या कहकर महबूबों के महबूब जाते हो ?




6 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 12 नवम्बर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. आपका बहुत ही धन्यवाद इस रचना को चुनने के लिये

      सादर,
      --- नील

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  2. वाह बहुत खूब....बहुत अच्छे हैं सारे अश'आर।

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  3. वाह!! पंक्तियाँ सारी बात कह गयी।

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