Monday, November 26, 2012

जाने किधर गया ,यारों किधर गया


फिर एक साल आज, युहीं गुज़र गया 
और दामन को ,सवालों से भर गया 

ढूंढता रहता हूँ बचपन को गली गली 
जाने किधर गया ,यारों किधर गया 

तिनको को पहले जलाया था शेख ने 
फिर उस चिड़िये का पर क़तर गया 

सब नहीं रहते हमेशा एक गुलशन में 
कोई इधर गया ,तो कोई उधर गया 

आज फिर होती रही अमन की गुफ्तगू 
आज फिर सरहद पे एक जवान मर गया 

जब तक नहीं टूटा था, रहा बाँटते खुशबू 
और टूटकर भी दिल में उतर गया

3 comments:

  1. सब नहीं रहते हमेशा एक गुलशन में
    कोई इधर गया ,तो कोई उधर गया

    Kya bat hai bahut hi badiya kavita

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  2. गहरे भावो की अभिवयक्ति......

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  3. बहुत आभार अलोक जी
    बहुत आभार सुषमा जी

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...