Sunday, May 1, 2016

मुंसिफ

ये है ज़रूरी  आप में कोई अदा भी हो ,
पर भूल जाना कि कोई फायदा भी हो

ये ज़मीं के अजूबे , लगते हैँ कभी छोटे
चाँद और सूरज सा  कोई फासला भी हो ,

मैं  बुरा हूँ ,मानता भी हूँ ,मेरे मुंसिफ
मेरे लिए कोई  मुस्सल्लम सज़ा भी हो

हमने दिया है कहाँ,लेकर गये कोई ,
ख्वाईश है कि उनमे मेरा खुदा भी हो

खामोशियाँ मेरी रगों में है कहाँ नयी ,
लेकिन नहीं चुप हूँ ,कि कोई जानता भी हो

हमको ना यूँ समझो कि ,वो क्यूँ रँग गया मुझमे
चेहरा अगर होगा तो कोई ,आईना भी हो

ये चीज़ क्या कम है कि ये आवाज़ गूँजेगी
जब "नील " ना होगा क़ोई आपसा भी हो

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-05-2016) को "लगन और मेहनत = सफलता" (चर्चा अंक-2331) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    श्रमिक दिवस की
    शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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