Tuesday, May 10, 2016

रुक गया

हम कि कुछ कहना भी चाहें ,हैँ ये अशरार जो
लड़खड़ाती बात पर इनका ,यूँ होना भी हो 

ख़ैर  कुछ बदला नहीं ,कि नींद से उठ जाएँ अब ,
एक कागज़ ही सरिका कोई बिछौना भी  हो

रुक गया देर तक मैं किस सुखनवर के यहाँ ,
उसको फ़िक्र-ऐ -कद नहीं ,कद मेरा बौना भी  हो 

लिख रहे हैँ अदा में  ,कि बस मासूमियत
के लिए कोई नया चारा  और खिलौना भी  हो 

एक  छिटकते पुराने ईंट ने किया बयाँ ,
दिवार के रँग से हि गर है वास्ता होना ,भी हो

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...