Tuesday, January 3, 2012

मुसाफिर !

कुछ अफ़साने रूह में उतर जाते हैं मुसाफिर
कुछ उम्मीद टूटकर बिखर जाते हैं मुसाफिर !!



आइना  लेकर  चलते   हैं  बेगानों  की तरह 
खुदी   को  देख   क्यों डर  जाते  हैं  मुसाफिर !!


शज़र को सींचते हैं  खून पसीने से मगर 
कुछ फल के लिए ,क्यों झगड़ जाते हैं मुसाफिर !!


ज़िन्दगी चलती है ,इसे चलना ही होता है
जो ख्वाब देखते हैं ,संवर जाते हैं मुसाफिर !!

सुना है दरख़्त पतझर में  वीरान होता है 
मगर अब पल भर में ,बिछड़ जाते हैं मुसाफिर !!

ए "नील" परछाइयों से क्यों आस करें  हम 
अँधेरे में वो   वायदे से , मुकर जाते हैं मुसाफिर !!












3 comments:

  1. bahut hi badhiya gazal.....kya kahane

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  2. नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!

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  3. आइना लेकर चलते हैं बेगानों की तरह
    खुदी को देख क्यों डर जाते हैं मुसाफिर !!

    बहुत खूब....

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...