Friday, April 22, 2011

शिव ने जिसको मस्तक पर धारा...


नदी के किनारे 
वो सवेरेसवेरे आया करता है 
ढूँढने अपनी परछाई
उसके बहते पानी में
पर जैसे उसका मन स्थिर नहीं है
वो बहता पानी भी नहीं

तो उसे अपने
सत्य स्वरुप का दर्शन कहाँ होगा 
अपने मन के दर्पण में झांक की तेरा मन ही 
तुझको संवारेगा ,यूँ गंगा गोदावरी के अर्चन से 
तुझे आत्म-अवलोकन कब होगा

वो कितना पाप धोएगी 
कितनो के आंसूं ढोएगी
अब उठ और आगे बढ़ 
की तेरे मन में ही कहीं गंगोत्री है 
शिव ने जिसको मस्तक पर धारा
वो गंगा तेरे मन का मैल धोती है 
शिव का है प्रताप ,वो गंगाधर कहलाये 
हर मनुष्य के मन में ही है गंगा 
क्यों भटके हम बौराए 

  

2 comments:

  1. सत्य कहा आप ने मन में ही गंगा और इश्वर का वास है..हम ब्यर्थ ही भटकते हैं..
    सुन्दर रचना के लिए आभार

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