Thursday, April 21, 2011

समुद्र के किनारे परे वो सीप

समुद्र के किनारे परे वो सीप 
आते हैं समुद्र के लहरों से निकलकर
चुनता है कोई उसे 
पिरोता है मालों में
कोई ले जाता है उसकी सुन्दरता से मुग्ध होकर 
फिर बढ़ाते हैं वो शोभा घर की 
वो सीप जो कभी किसी जीव का रक्षा कवच था 
आज शोभा बढा रहा है किसी के घर का 
अपने पालक होने का अस्तित्व निभाकर उसने 
अब दुसरे कर्त्तव्य को धारण कर लिया है 
पर उसे तराशने वाला वो माला  पिरोने वाला 
वो उस सीप के लिए एक इश्वर है
जो की उसमे एक नव जीवन देता है 
एक पहचान देता है
उस सीप को जिसे समुद्र की लहरें कभी रेत तो कभी पानी
के बीच कुदेरेते रहते हैं....इस जीवन के तरह जहाँ मानव एक सीप है 
और पहचान की तलाश में भटक रहा है सच और झूठ के खेल के बीच ..
इंतज़ार है इश्वर का...

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The snail shells are lying along the shore of the ocean
crumbling in summer ,winter ,spring,rain so often

After the tides come and throw them out of its engulf
before a tide comes, somebody pick them up 

and turned them into decorative masterpiece
which gave the beauty of the home a divine bliss

the common man who appreciate their values is a god 
The shells which were no where is now in abode


the shells which protect the little snails during its life time
has now got a new image and a new avatar just because of his artistic divine. 


The shells which were being corroded going here and there
between  the sea waves and the sand 
have got a rescuer ..........


And same is with the humans
who are wandering in this life and entangled between the foul play of lie and the truth..
waiting for the almighty to deliver ...

1 comment:

  1. शानदार लिखा है आपने. बधाई स्वीकार करें
    मेरे ब्लॉग पर आयें और अपनी कीमती राय देकर उत्साह बढ़ाएं
    समझ सको तो समझो : अल्लाह वालो, राम वालो

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