Saturday, April 30, 2011

हाँ कुछ टूटा है..

हाँ कुछ टूटा है ..
कुछ उम्मीदों का घड़ा 
शब्दों के कंकड़ से 

या फिर उसने 
भावों के लहर 
को एक उद्गम मार्ग  दे डाला है 

इस रेत के शहर को 
जो उम्मीद रखते ही नहीं हैं 

जब शीशा टूटता है 
तो आवाज़ भी नहीं आती 

कर्णप्रिय भी नहीं होती 
और घायल भी करती है 

पर उम्मीद का घड़ा जब
टूटता है 
तो सारी आवाज़ वीराने में
खो जाती है 

पर  दे जाती है 
प्यासे रेत के शहर को 
एक बूँद ज़िन्दगी की ...

समर्पित कर दे ..



समर्पित कर दे अब  वर्त्तमान को 
तू भटक न जाना संसार में 

अर्पित कर दे  सब  कर्म को 
तू ठिठक न जाना तिरस्कार से 

द्रवित कर ले ह्रदय  पाषाण को 
तू दहक न जाना अहंकार में 

संचित कर ले सत्य धर्म को 
तू बहक न जाना प्रचार में 

कम्पित कर दे  व्यर्थ  अज्ञान को 
तू छिटक न जाना   मझधार में 

खंडित कर दे अर्थ भ्रम को 
तू खनक न जाना व्यापार से 






Friday, April 29, 2011

बुझना ही था तो कुछ ऐसा हो....

मशाल  बुझी  मुसाफिर  की   
और  साए  ने  साथ  छोर दिया 

चिराग जो भीतर था 
उसे ढूँढने चला था वो 

उस मशाल से मिल जाए 
ये कब मुमकिन हुआ 

चाहे मीलों वो बढे जाए 
एक दिन उसको रुक जाना था 


खुद के रंगों से  था अनजाना 
पर हर रंगों से था पहचान किया 

देखकर बुझती लौ को घबराया 
अँधेरे से अनजान था जो 

हो गए सारे रंग काफूर 
तब उसको इसका भान हुआ 

बुझना ही था तो कुछ ऐसा हो
खुद दीपक बन बुझ जाना था 




एक कच्चे धागे पर निरंतर वो चलता है




एक  कच्चे धागे पर 
निरंतर वो चलता  है 

दीवाना है ,अपने 
साहस को परखता है 

एक छोर पर 
दिया का बंधन 

एक छोर पर 
गुफा है गहन  

पर वो दूर 
एक लौ से प्रेरित

बढ़ता है 
उस धागे पर नित 

अनभिज्ञ है 
उसकी ज्वाला से वो 

डोर का दहन भी 
करेगी एक दिन जो 

पर चलना है 
चलता ही जाता है 

उस लौ से 
संबल पाता है 

मन का पंछी 
धीरे धीरे 
बस आगे 
बढ़ता  जाता है ...

अन्धकार से 
प्रकाश को 

दीपक से 
मिलने की आस को 

वो दीवाना 
सपनो के डोर पर 

एक छोर से
दूजे छोर पर 

बस आगे 
बढ़ता जाता है 

मन का पंछी 
धीरे धीरे 
बस आगे 
बढ़ते जाता है .



Thursday, April 28, 2011

पर वो निरंतर ही बस आते हैं चले जाते हैं ...

कबूतर  रोज़ शाम 
मेरे घर की मुंडेर पर
आते हैं 

पिंजर बंध थे
बचपन से वो

बस आते हैं 
चले जाते हैं 

सिखा न था स्वछंद विचरण
देखा न था कभी भी दर्पण 

कुछ चेहरे उन जैसे ही हैं 
पर वो तो आश्चर्यचकित हैं 

उनके आवाज़ भी मिलते जुलते 
पर वो कितने प्रसन्नचित हैं 

कुछ हवा मिले ताज़ी ताज़ी
हृष्ट पुष्ट बने वो भोले भले 

इसलिए उनके दाता ने
दी है छोटी सी स्वछंदता 

उनको यूँ आना और जाना 
लगती है जीवन की सत्यता 

पर वो हैं स्वार्थ से अनजान 
दुनिया के रंगों से बेखबर 

कल किसी बेनाम हाट पर 
होंगे उनके नीलामी के स्वर 

होगा तब भान उन्हें 
स्वतंत्रता क्या है ज्ञान उन्हें 

पर वो निरंतर ही
बस आते हैं 
चले जाते हैं ...

कबूतर  रोज़ शाम 
मेरे घर की मुंडेर पर
आते हैं 




निशांत अभिषेक 

चींटी आवाज़ नहीं करती पर .....


चींटी आवाज़ नहीं करती 
और केकड़ो सी 
हसरत भी नहीं होती 

पर अपने मिटटी के ढेर से बने
घर से हमें शिल्पकार होने 
का एहसास करा देती है 

वर्षा आती है 
और फिर वो कुछ मरे हुए 
कुछ छोरे हुए को समेट
एक साथ मिलकर इस 
विपत्ति का सामना करती है  

हमें ढकने के लिए 
घर का मुंडेर मिल जाता है 

और हम अगले वर्षा का
इंतज़ार करते हैं
फिर से उस मुंडेर के निचे बैठ 
नाश्ता करते हुए 


और बिजली के कड़क से घबराकर 
घर के भीतर चले जाते हैं 
हमें वो आवाज़  
साफ़ सुनाई दे जाती है 


पर वो चींटियाँ 
अपने छोटे से जीवन काल में 
हमें बहुत कुछ बता जाती है 
अपने मूक आवाज़ से 
वर्षा की बूंदों से लरते हुए 

इस आवाज़ को सुनने 
में कई वर्षा आती हैं 
और जाती हैं 

एक चिंटी के लिए 
वो वर्षा की पहली बूँद 
एक सागर जैसा है 

और हमारे लिए मौसम 
बदलने और दिनचर्या बदलने 
का पैगाम......

और फिर उस सन्नाटे में उसे एक बुलंद आवाज़ मिल जाती है ...

बहुत दूर 
अनजाने सड़कों पर 
अनजाने से चेहरों के बीच 
साथ कोई अपना सा लगता है 
जब भीड़ में खो जाना 
बड़ा डरवाना सा लगता है 

साँसे तेज़ हो जाती है 
और आ जाती है वो 
धडकनों को संभालने 

बुझे हुए चेहरे 
झुलसे हुए बदन को 
आँचल से सवारने 

और फिर सारे चेहरे 
अपने से लगने लगते हैं 
हर दिल मिलकर
धड़कने से लगते हैं 

और उस धून से 
उसके  माँ की पुकार आ जाती है 
और फिर उस  सन्नाटे में 
उसे एक बुलंद आवाज़ मिल जाती है ...


 निशांत अभिषेक 

Wednesday, April 27, 2011

और इसी आस में आस्था अब भी जीवित है गुलाब में...

अनमने  से  चेहरे 
देखते हैं मुझे 
कुछ बबूल से 
कुछ अमर बेल  से 

और असहाय हो जाता हूँ 
उनके मूकता से 

उनके दुष्ट  स्वाभाव 
उनके निजता से 

ढूँढता हूँ 
गुलाब सा कोई उन चेहरे में 
जो न बोले भी 
दिव्यमान कर दे मन को 

और दृढ़ता करने  पर 
अपने शौर्यता का भी परिचय दे 
अपने काँटों से 

और ऐसे चेहरों के तलाश में 
रोज़ चलता हूँ 
कभी पत्थरों पर...
कभी हरे भरे घास पर...

मेरी निगाहें गुलाब के आस में 
कोयला बन गयी है 

जो चिंगाड़ी  लगाने 
पर जला देती है 
मेरे सारे पीडाओं को ....

पर उस जलन को ज्यादा नहीं झेल सकता 
गुलाब के पंखुरियां ..
और उसके कांटे
मेरे कष्ट हर लेंगे. 

और  इसी आस में 
आस्था अब भी जीवित है  गुलाब में...











भ्रस्टाचार कैसे रोकें?----3

भ्रस्टाचार  पनपता है अत्यधिक सहनशीलता से भी | अन्याय का विरोध आवश्यक है पर इसके लिए समाज का साथ देना अति आवश्यक है | आदरणीय किरण बेदी जी ने भ्रष्ट लोगों के विरुद्ध जो आवाज़ उठाई उसमे हम जनता और मीडिया का भी सहयोग रहा | मकसद ये होना  चाहिए की भ्रष्टाचार मन से दूर हो जाए | मन की मलिनता को दूर करने से आने वाली पीढ़ी भी सत्य और अमन के राह पर चलेगी |


घर में हो रहे पति पत्नी के मनमुटाव और झगडे का असर अपरिपक्व बच्चों पर भी पर सकता है और वो इनका अनुशरण करेंगे | अतः घर में एक स्वच्छ वातावरण का निर्माण करना चाहिए |

हमें छोटे छोटे नियम जैसे विद्यालय प्रतिदिन जाना, गुरु जी के द्वारा दिए हुए गृह कार्यों को पूरा करना आदि का पालन करना चाहिए | कक्षाएं  बंक करने और इसे प्रेरित करने वालों को समझाना चाहिए  शिक्षा  का महत्त्व | बाद में नौकरी करने समय उन्हें छूट नहीं मिलेगी मनमानी की | अतः जीवन संघर्ष के लिए इन छोटी छोटी बातों को जरूर मानना चाहिए | एक दुसरे की मदद करनी चाहिए | जिससे सभी को मानसिक संबल मिलते रहे | 

पर्व त्यौहार के नाम पर चंदा लेकर देवी देवताओं का अपमान करने वालों का मिलकर विरोध करना चाहिए | आखिर सबके मन में ही इश्वर है | ऐसी घटनाएं आम हो गयी है की अमुक ऑटो चालक को पीटा   गया क्यूंकि उसने चंदा देने से मन कर दिया था | सरकार को ऐसे पूजा समितियों पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए | ज़बरन वसूली कटाई बर्दाश्त नहीं होगी | पर्व त्यौहार में विसर्जन के दौरान बजने वाले अशलील गीतों को बंद कर देना चाहिए कानूनी नियम बनाकर |  दो गुटों के बीच लड़ाई हो जाती है विसर्जन के दौरान | पुलिस इसका ध्यान रखें  और हाकी  स्टिक ,तलवार ,आदि लाने पर शख्त  पाबंदी हो | 



सत्यमेव  जयते---भारतीय एकता जिंदाबाद 



भ्रस्टाचार कैसे रोकें? ----2

भ्रस्टाचार  का  एक  कारण  मजबूरी     भी  है  | नौकरी  न    मिलने   पर  गरीब  लोग   बहकावे में आ जाते हैं | सरकार को  तम्बाकू , सिगरेट  , शराब आदि पर कम निवेश कर के नौकरी मुहैय्या  करनी होगी उन्हें नहीं तो वे दलालों के झांसे में आ जाते हैं | 

कुछ चिकित्सक इस पावन पेशे को बदनाम करते रहते हैं | गरीबों का इलाज़ कम पैसों में किया जाना चाहिए | जरूरतमंदों के लिए अमीर तबके के लोग खुल कर सामने आयें | मंदिर में दान देने से अच्छा किसी की ज़िन्दगी बचानी होती है | एक ज़िन्दगी के सहारे पूरा परिवार जुड़ा होता है | 

ट्रेफिक नियम की धज्जियाँ उड़ाने वालों के खिलाफ उचित कार्यवाही की जानी चाहिए पर साथ साथ ऐसे पुलिस  कर्मियों के विरोध में भी स्वर उठाई जानी चाहिए जो रिश्वत लेकर ट्रेफिक नियमों की धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं ऑटो चालकों और बस ट्रक चालकों के आड़ में |

शिक्षा का प्रचार और प्रसार देश के हर कोने में होना चाहिए | भोले भले लोगों को उनके अधिकार के बारे में बताना चाहिए | ग्राम पंचायत के स्तर  पर ये कार्यवाही होनी चाहिए | सभी को उनके काम का उचित वेतन मिले | इसके लिए असाक्षरता का दूर होना अति आवश्यक है | 

काला बाजारी रोकने के लिए सरकार को एक तय सीमा से ज्यादा रासन आवंटन नहीं करना चाहिए और एक निश्चित समय सीमा तय कर देनी चाहिए | उसके बाद बचे हुए माल को वापस ले  लेना  चाहिए | इससे भ्रस्टाचार में थोड़ी कमी आएगी | 



सत्यमेव जयते --भारतीय एकता जिंदाबाद 



Tuesday, April 26, 2011

भ्रस्टाचार कैसे रोकें?---1

भ्रस्टाचार कैसे रोकें?
 इससे पहले ये अवगत होना आवश्यक है की इसका बीज कहाँ से उत्पन्न होता है |
माँ बच्चों को घर में शिक्षा देती है मन लगाकर पढो और पिता पढने में उसकी मदद करते हैं | विद्यालय में ये शिक्षा  दी जाती है की हमें अनुशाशन में रहना चाहिए | हमें बड़ों का सम्मान और छोटों  को स्नेह देना चाहिए | हमें प्रार्थना  करना सिखाया जाता है जिससे  हमारा  मन कलुषित विचारों से दूर रहे और हम अच्छे व्यवहारों को सीखे और सिखाएं  | परीक्षाएं ली जाती है जिसमे हम अपने मेहनत से उत्तीर्ण होते हैं  | अगर हर छात्र अपने पर विश्वास करे और मेहनत से अनुशाशन के साथ रहे और अपने गुरुओं की बातों को माने तो इस भ्रस्टाचार  का अंत इसके जन्म लेने से पहले ही हो जाए |


"भ्रष्टाचार के पापी बीज को हम पनपने न देंगे
 देश के दामन पर दाग हम लगने न देंगे 


कदाचार से मुक्त होगी परीक्षा 
आत्मनिर्भर बनने की इच्छा


मानसिक बल को अपने हम मरने न देंगे 
गलत दिशा में किसी को हम भटकने न देंगे "

कुछ बड़ा होने पर हम महाविद्यालयों में जाते हैं | वहाँ  अगर हम कदाचार मुक्त रहें और प्रमाण पत्र मांगे जाने के बदले में धन राशि लेने के धंधे का मिलकर विरोध करें तो ये भ्रस्टाचार युवकों के खून से बाहर   निकल जायेगी और देश का नव निर्माण हो सकेगा |

आज युवक अपने ज्ञान का दुरूपयोग कर रहे हैं | वो नए नए ठगने के तौर तरीके सिख कर दुसरे कमजोर छात्रों से पैसे लेकर परीक्षा में उनके बदले बैठते हैं और इससे मेधावी छात्रों का बहुत नुकसान  होता है, साथ ही देश के युवा खून भी मैले हो जाते हैं | आने वाली पीढ़ी क्या सीखेगी  ? इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अभियांत्रिकी का सहयोग लेना चाहिए | हस्त लिखित प्रमाण,अंगुली चिह्न लेना,विडियो बनाना आदि |
जिस दिन ऐसी परीक्षाएं होती हैं उसी दिन अगर महाविधायालयों में भी परीक्षा रख दी जाए तो और भी अच्छा रहेगा |

महाविधालय में प्रवेश करने से पहले छात्रों का पूरा परिचय ले लेना चाहिए |
बायोमेट्रिक  कार्ड को किसी भी परीक्षा देने समय लाना आवश्यक कर देना चाहिए|
और उसके सभी डाटा को परीक्षा केंद्र में समेटने के लिए तंत्र लगाया जाना चाहिए| भारत के अभियंता और वैज्ञानिक   ऐसा करने में सक्षम हैं | बस सरकार  और परीक्षा आयोजित करने वाले संस्थान  अपना पूर्ण सहयोग दें |
जिनके पास बायोमेट्रिक कार्ड नहीं है उनंके ऊँगली चिन्ह या रेटिना को पहचान मान उनका डाटा समेट लेना चाहिए  | परीक्षा केन्द्रों परइसके लिए तंत्र लगाना चाहिए |  कुछ वक़्त जाया होगा पर मेधावी छात्रों और देश का नुकसान तो नहीं होगा |
अगर आभियांत्रिकी क्रांति से भ्रस्टाचार का समूल नाश हो सकता है तो थोड़ी परेशानी सही जा सकती है एक बेहतर भारत के लिए|

नेताओं को चुनने वक़्त हमें उनके द्वारा किये गए पिछले कार्यों पर ध्यान देना चाहिए और मत का प्रयोग सचेत होकर करना चाहिए 
अगर सरकार ठीक से वायदे नहीं निभा रही ही तब मीडिया , प्रेस , समाचार-पत्र , ब्लॉग आदि के माध्यम से उन्हें आगाह करता रहना चाहिए |

कहीं भी अगर रिश्वत मांगी जाए तो मिलकर इसका विरोध करनी चाहिए 
आखिर मेहनत से कमाते हैं रिश्वत क्यों दे और क्यों लें |
ये जान ले की कफ़न में जेब नहीं होता |

मूल्य से अधिक रुपये मांगे जाने पर इसका विरोध करें और उस दुकानदार से न ले सामान |
अगर वो  फिर भी नहीं माना तो इसका विरोध उपभोक्ता अदालत में करायें 
और बिल लेना न भूलें नहीं तो कानूनी कार्यवाही में अड़चन आ जायेगी |
जब भी हो पीड़ित का साथ दें | आवाज़ दे हम एक हैं |


मैनेजमेंट कोटा  के नाम पर लाखों लेने वाले  संस्थानों को बंद करवाने के लिए मुहीम छेड़ें | सम्पति का केन्द्रीयकरण रोकने  लिए प्रयास करें | ऐसे संस्थान मेधावी छात्रों को तो नौकरी लेने में अड़चन देते ही हैं और बड़ी बड़ी ज़मीन पर कब्ज़ा करके बैठे रहते हैं | रईसजादे दौलत के दम पर प्रवेश लेकर उनको बढ़ावा देते हैं | सरकार को इनके खिलाफ शख्त  कदम उठाना चाहिए |

कोचिंग  संस्थानों के खिलाफ भी कार्यवाही होनी चाहिए |छात्रों का मानसिक विकास अवरुद्ध होता है | उनकी नैसर्गिकता का हनन होता है |


छात्र  भारत के उच्च संस्थानों से पढ़कर विदेश में नौकरी करने चले जाते हैं |
वो यहाँ रहकर अपने स्वच्छ  विचारधारा से  भ्रस्ट हो चुके नौकरशाही से   निजात दिलाने में अग्रिम भूमिका निभा सकते हैं | उन्हें अब आगे आना होगा तभी देश से भ्रष्टाचार का नाश होगा और अगर वो यहाँ आने में सक्षम नहीं हैं तो मीडिया ,ब्लॉग आदि के द्वारा भ्रस्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठायें | सब एक दीप जलाएं तो क्रांति की मशाल जली रहेगी | जय हिंद | 


जल्दी पाने के होड़ में हमें गलत तरीके नहीं अपनाना होगा | सिफारिश से ली गयी नौकरी से अच्छा है हम अपने दम पर आत्न्निर्भर बने और एक उदाहरण बने दूसरों के लिए  |

न्याय मिलने में यहाँ गवाह खरीद लिए जाते हैं | हमें फास्ट ट्रैक कोर्ट से गंभीर रूप से पीड़ितों के दुःख का निवारण करना होगा | ज़ुल्म करने वालों के विरुद्ध आवाज़ उठाना होगा |कलम से वाणी से या ज़रुरत पड़ी तो कटार   से भी हमें दुष्टों को सजा देना होगा |

हम भारत के न्यायालय   का सम्मान करते हैं लेकिन मानवीय मूल्य जिसपर भारत टिका हुआ है ,जिससे इसकी पहचान है पुरे जग में ,उसका सम्मान करना होगा नहीं तो क्रान्ति होगी 
कलम से |ये लाल बहादुर का देश है , ये वीर सुभाष चन्द्र बोस का देश है ,ये कलाम ,किरण बेदी और सबरीना लाल का देश है | हम सत्य की क्रांति से दुश्मन को थर्रा सकते हैं |न्याय के लिए पूरा भारत एक है |जिस जोश के साथ जवान अपनी बन्दूक चलाते है भारत माँ की लाज बचाने के लिए..उसी जूनून के साथ हम भी अपनी कलम से,अपने सत्य क्रांति से दुष्टों के नाक में दम कर देंगे ...


"

चला अकेला ही था  वो 
वो कलम का एक सिपाही था 

प्रेमचंद या हो दिनकर 
वो शब्द-क्रांति का एक प्रहरी था 

विपत्ति  आती है जब जब 
जीवन मद्धम हो जाता है 

कलमकार शब्दों से लड़ता 
हर युद्ध जीतता जाता है 

सोये जनमानस को भी 
एक राह वही दिखलाता है 

जागृति लाता है 
और युग बदल जाता है 

ओर्विन्दो ,दिनकर ,सुब्रमण्यम के 
शब्दों ने बिगुल विप्लव की  बजायी  थी 



बिस्मिल   ने भी शब्दों से ही 


वर्तानियों    की   नींद    उडाई    थी 

वक़्त ने ललकारा है फिर  कलम धरो   
 नौजवानों   भ्रटाचार    से जूझ   पड़ो   "





सत्यमेव जयते...भारतीय एकता जिंदाबाद 















वो रौशनी सूरज की और मेरे कलम की स्याही ....

अक्सर वो झांकता है 
और साथ में 
कुछ छुपे हुए समस्याओं से
भी अवगत कराता है 

जब अँधेरे कमरे में बैठे हुए
पुराने कागजों पर 
अपनी व्यथा लिखता हूँ 
धीरे धीरे  मन की समस्याओं से
परिचित हो जाता हूँ 
समाधान भी मिल जाता है 

ठीक उसी तरह जैसे बंद कमरे में पड़ी धुल
उसके आने से स्पष्ट दिखाई दे जाती है 
मेरे खिड़की खोलने के बाद 
और घर की सफाई करने को इंगित करती है ..

वो रौशनी सूरज की 

और मेरे कलम की स्याही ....
दोनों कभी कभी एक से लगते हैं ...


जब प्रकृति अपने चमत्कारों से रूबरू हमें कराती है

 पत्ते पर  परे ओस की बूंदे
मोती नहीं होती 
पर किसी पपीहे ,किसी भौरें 
की प्यास बुझा सकती है 

किसी राहगीर को जीवन दान 
और स्फूर्ति  दे सकती है 

मोतियों के  माला की 
कीमत नगण्य हो जाती हैं 

जब प्रकृति अपने चमत्कारों से 
रूबरू हमें कराती है 

जौहरी मोती की  पहचान कर सकता है 
सुख सुविधा से संपन्न वो 
उसकी  कीमत का अनुमान कर सकता है 

पर प्रकृति सर्वथा अनमोल है 
उसकी शक्ति निरंतर एवं अविरल है 
उस की महिमा का  वो थका हारा पथिक ही 
बखान कर सकता है 




ओ दूर से टिमटिमाने वाले तारे

 तेरे न टिमटिमाने को 
को न समझूंगा तेरा न होना

बादलों में होड़ होगी तुझे
देखने की तो
मेरे भोले मन को क्यों रोना

चांदनी रात में तेरे टिमटिमाने को
मैं नहीं भूलूंगा
की चाँदनी तो कुछ दिन के लिए
होती है मेरे साथ
तू मुझे हमेशा मुझे मुस्कुराना
सिखाता रहता है


रात को तू टिमटिमाता है
मेरे दूर के तारे
और सूरज तेरा दोस्त
तेरी कमी को
सवेरे पूरा करता रहता है

तू बहुत उदार है मेरे तारे
तुझे बचपन से देखता आ रहा हूँ
तू टिमटिम करे या नहीं
सूरज की लाली मेरे मन के बंजर
का करता है नित्य सिंचन

सूरज अपनी लाली से
काली रात्री के भय से
मुझे मुक्त कर मेरे कल
का करता है नव सृजन

शायद कल मैं तुझसे बहुत दूर
हो जाऊं
शायद तुझे क्या सूरज को भी
देखने को तरस जाऊं
पर तेरा वो रोज़ टिमटिमाना
मुझे इंगित करता रहेगा
कि तू हमेशा मुस्कुराता है
और तेरी मुस्कराहट
अमावस की रात को
और भी बढ़ जाती है ...
और मुझे संबल देती है मेरे जीवन
के आने वाले संघर्ष के लिए...


ओ दूर से टिमटिमाने वाले तारे
तेरे न टिमटिमाने को
को न समझूंगा तेरा न होना ..

Sunday, April 24, 2011

और आज उस तार के पेड़ को को हम चुनौती देते हैं

वो ताड़  का पेड़ अब भी है 
कल उसके ऊपर वो नशा करने वालों 
को अमृत पिलाने का कार्य करने वाला 
वो 
गरीब घर का एक आम आदमी 
बड़ी चपलता से ,निर्भयता  से ऊंचाई 
पर पहुँच जाता था 
और हम उसके इस करतब को निहार 
कर प्रस्सन होते थे
सोचते थे की काश हम भी 
उस ऊंचाई पर चढ़ नीचे की दुनिया को 
देख पाते पर हमें क्या पता था की 
उंचाई पर चढ़ने के लिए बहुत साहस का होना 
जरूरी है 
आज उस ताड़ के पेड़ के बगल में एक ऊँचा इमारत खड़ा है और
हम आसानी से उसके मुंडेर  पर खरे  हो
उसपर बैठे पंछियों को निहारा करते हैं 
और आज उस तार के पेड़  को को हम चुनौती देते हैं 
हम उसके ऊंचाई तक पहुँचने के लिए
सीढ़ी का इस्तेमाल करते हैं 
और वो ताड़ी बेचने वाला अपने पैरों और हाथों  का ....



Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...