Saturday, June 4, 2011

तू ही हमारी नूर थी !



तू पास था दिल के साथिया,जब ज़िन्दगी मुझसे दूर थी  
तेरी  हर बात मेरा ख्वाब ,हर अंदाज़ मेरा  गुरूर थी 

अनजान  ही  रहा  सदा  , इस जहां  के  मिज़ाज  से 
 आशिकी  अपनी मगर ,तेरे शहर में  मशहूर  थी   

तुझसे गिला करता , ऐसा था  न अपना सिलसिला 
हमको तो तेरी सादगी से बेवफाई भी  मंज़ूर थी 

तू न बदले गम नहीं , बदले न तेरी शिरत कभी 
दफन हर अरमां  कर सकूं ,ये  कोशिशें बदस्तूर थी 

तुझसे बिछुड़े हुए यूँ तो ज़माना हो गया 
हर अमावस में मगर , तू संभालती ज़रूर थी 

अब जो तुझसे फिर कभी मिल न सकेंगे साथिया 
कैसे भुला दें  हम मगर ,कि तू ही दिल- ए -नूर  थी 

8 comments:

  1. दिल से लिखी गयी रचना आभार

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  2. अनजान हरदम ही रहा ज़माने के मिजाज़ से
    पर हमारी आशिकी तेरे गलियों में मशहूर थी
    vah kya bat hai !bahut khoob .badhai .

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  3. अनजान हरदम ही रहा ज़माने के मिजाज़ से
    पर हमारी आशिकी तेरे गलियों में मशहूर थी

    वाह नीलेश जी खूबसूरत शेर बधाई

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  4. तू न बदले कोई गम नहीं , शिरत बस तेरी न बदले
    दफन हर अरमान कर सकूं ये कोशिशें बदस्तूर थी
    ... bahut badhiyaa

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  5. बहुत ही उम्दा शब्द है !मेरे ब्लॉग पर आए ! आपका दिन शुब हो !
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  6. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल पे्श की है आपने!

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