Sunday, June 5, 2011

हर कवि है इश्वर इस मंदिर में


कागज़ है पूजा की थाली 
और 
तिलक स्याह से करते हैं ,
भोग भाव के बना बना 
हम 
मन के  मंदिर में 
अर्पण करते हैं ,
प्रसाद कविता की होगी 
हर कवि  है इश्वर  इस 
मंदिर में ,
कलम से शंख  ध्वनि कर
आह्वान उन्ही का 
करते हैं ,



6 comments:

  1. आपकी बात से सहमत है बहुत सुंदर प्रस्तुति.....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  3. waah! bhut gahri baat itne saral aur khubsurat shabdo me kah di apne...

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  4. bahut khoob!! padhna behad achha laga.

    shubhkamnayen

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Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...