Wednesday, June 8, 2011

आऊंगा,ज़रूर मैं आऊंगा ....

जब  दुआएं  संग  है  
और  बाकी  है  जीने  की  ललक  ,
तब  सूरज   की  लाली   को  छुपा   लाऊँगा  
चाँदनी  से  सफेदी  चुरा  लाऊंगा 

घास  पर  नंगे पाँव चलते -चलते  हरे  हो ही  गये  हैं  अपने  सपने 
और  न  मिली   भी   मुझे  
वो   दूर  खड़ी  ललचाती  हुई  फलक  !!

तो  ख़्वाबों   के  समुंदर  में  डूब 
मोतियों  से  शब्दों  को  चुन  ..
गीतों  की  माला  ही  बना  लाऊंगा ,

पर  आऊंगा  ज़रूर  गाँव  वापस  ...
कुछ  नहीं   तो  सपनो  को  संग  ले  आऊंगा  ..

आऊंगा,ज़रूर   मैं  आऊंगा ....

3 comments:

  1. bhut hi khubsurat rachna.. very very nice...

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  2. तो ख़्वाबों के समुंदर में डूब
    मोतियों से शब्दों को चुन ..
    गीतों की माला ही बना लाऊंगा ,

    पर आऊंगा ज़रूर गाँव वापस ...
    कुछ नहीं तो सपनो को संग ले आऊंगा ..

    Very emotional creation !...thanks Neelansh ji.

    .

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