Thursday, June 16, 2011

नूर-ए-खुदा से रौशन ये जिंदगानी हो गयी !

मिट गया वो जिस पे तेरी मेहरबानी हो गयी
बेनाम था मगर अब उसकी भी कहानी हो गयी!!

वो बादलों को ओढ़ लेती है   ,तुम तारों में खो जाते हो
खुद करते हो नादानी ,उसकी बदगुमानी हो गयी ?

ज़ेहन को दूर रख कर ही इश्क किया करना
वरना न फिर कहना कि, कारिस्तानी हो गयी!!

दर्द-ए-जिगर ही तो आशिकों कि मुकम्मल दवा है
इस दर्द को चख कर ही, मीरा दीवानी हो गयी!!

इश्क-ओ-मोहब्बत तो उसकी ही बंदगी है
नूर-ए-खुदा से रौशन ये जिंदगानी हो गयी!!

5 comments:

  1. दर्द-ए-जिगर ही तो आशिकों कि मुकम्मल दवा है
    इस दर्द को चख कर ही, मीरा दीवानी हो गयी!!
    बहुत अच्छे शेर, मुबारक हो !!!!

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  2. .

    दर्द-ए-जिगर ही तो आशिकों कि मुकम्मल दवा है
    इस दर्द को चख कर ही, मीरा दीवानी हो गयी!!..

    Great expression ! Neelansh ji .

    .

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा कल शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी है!

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