Thursday, May 5, 2011

अभिनय करते हैं मेरे शब्द

अभिनय करते हैं मेरे शब्द
भावों के निर्देशन पर 
वक्ता स्वयं और द्रष्टा स्वयं 
बनता हूँ मैं मंथन कर कर 

अंतर्ध्वनि को काले अक्षर 
में कह जाता हूँ 
शीतलता गंगाजल सी 
मैं अर्पण करता जाता हूँ 

अभिमत होता हूँ इनसे
ये मेरे मन के वशंज हैं 
कष्टों के इस सर में 
वो खिलते एक पंकज हैं 

उनके आकर्षण से 
शब्द बादल बन बरसते हैं 
मन की घाटी से तब 
शब्दों के धार निकलते हैं 

ये शब्द एक दर्पण हैं 
जो निज से सबको मिलाता है 
उनके अस्तित्व का 
ये दर्शन उन्हें कराता है 

इसके बंधन में बंधने से
हर बंधन छूट जाता है 
हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

हर मन फिर इन शब्दों का 
एक पावन मंदिर बन जाता है 

2 comments:

  1. बहुत सुंदर ... सच में शब्द दर्पण समान ही होते हैं....सार्थक पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  2. shabd yadi abhinay n karen to jivan ke rangmanch per kuch nahi rah jayega

    ReplyDelete

Kshitiz

Wo kshitiz hai paas nahi aata, Jaise sach ho ,jo raas nahi aata Tum aaye the lekar Josh -o -junoon, Ab kya hua,kahte ho kaash nahi aata !...